संत कबीर साहिब ने दुनिया को सुरति-योग का रहस्य नामक गहन आध्यात्मिक विज्ञान प्रदान किया। इस प्रकार का योग व्यक्ति को ध्यान और आत्म-जागरूकता के माध्यम से अपनी आत्मा की गहराई तक पहुँचने की अनुमति देता है। दुनिया की सभी क्षमताएँ सुरति या ध्यान से उत्पन्न होती हैं। यह मनुष्य को उसकी चेतना को जगाने के अलावा ब्रह्मांड की दिव्य ऊर्जाओं से जोड़ता है। सुरति और निरति का रहस्य, उनकी ताकत और आत्मज्ञान में उनका योगदान, सभी को इस निबंध में विस्तार से समझाया जाएगा।
सुरति का महत्व
सुरति-योग का रहस्य है—ध्यान, चेतना और जागरूकता। यह आत्मा का एक ऐसा गुण है, जो संसार के समस्त कार्यों को संचालित करता है। यदि सुरति का उपयोग सही दिशा में किया जाए, तो व्यक्ति परमपुरुष तक पहुँच सकता है। संतों ने सदैव सुरति को जागृत करने पर बल दिया है क्योंकि सुरति ही ब्रह्मांड की सृजन शक्ति है।

सुरति के मुख्य गुण:
सुरति-योग का रहस्य – सुरति के बिना कोई कार्य संभव नहीं। बोलना, सुनना, देखना, महसूस करना—सभी क्रियाएँ सुरति पर निर्भर करती हैं।
ध्यान का आधार – ध्यान में जिस तत्व की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, वह सुरति है।
आत्मज्ञान का द्वार – जब सुरति संसार से हटकर आत्मा पर केंद्रित हो जाती है, तब आत्मज्ञान संभव होता है।
सुरति और निरति का रहस्य
संत मत के अनुसार,सुरति-योग का रहस्य सुरति और निरति दो महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, जो मनुष्य के भीतर कार्यरत रहती हैं।
सुरति – यह आत्मा की शक्ति है, जो चेतना को जागरूक बनाती है और परमात्मा से जोड़ती है।
निरति – यह माया में उलझी हुई चेतना है, जो संसार में भटकती रहती है।
सुरति और निरति का संबंध:
जब ध्यान नाभि की ओर जाता है, तो इसे निरति कहते हैं।
जब ध्यान सिर से ऊपर उठकर उच्च अवस्था में पहुँचता है, तो इसे सुरति कहते हैं।
निरति का प्रवाह नीचे की ओर रहता है और यह शरीर तथा इंद्रियों में उलझी होती है।
सुरति का प्रवाह ऊपर की ओर होता है, जो ध्यान और आत्मसाक्षात्कार में सहायक होता है।
साहिब कबीर कहते हैं:
“सुर्त फँसी संसार में, तासों परि गयो धूर।
सुर्त बाँध स्थिर करो, आठों पहर हुजूर।।”
अर्थात सुरति-योग का रहस्य सुरति को संसार से हटाकर परमात्मा में स्थिर करने से ही आत्मज्ञान संभव है।
मन और इंद्रियों का जाल
मनुष्य की सुरति इंद्रियों के माध्यम से संसार में उलझी रहती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार—ये सभी मन की वृत्तियाँ हैं, जो आत्मा को अपने बंधनों में जकड़े रहती हैं। जिस प्रकार पिंजरे के तार पक्षी को कैद रखते हैं, उसी प्रकार मन की वृत्तियाँ आत्मा को जकड़ लेती हैं।

मन और इंद्रियों से मुक्ति कैसे पाएँ?
ध्यान और साधना के द्वारा सुरति को उच्च अवस्था में ले जाना आवश्यक है।
मन को गुरु के चरणों में समर्पित करने से ही सुरति को स्थिर किया जा सकता है।
सद्गुरु के मार्गदर्शन में सुरति को आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाया जा सकता है।
कबीर साहिब कहते हैं:
“तीनों गुण ते न्यारा खेलै, मनुआ सत्य सुमिरन मेलै।
श्वाँस सुरति एक डोरी लावे, अजर अमर होई लोक सिधावै।।”
इसका अर्थ है कि सुरति को आत्मा से जोड़ने से अमरत्व प्राप्त होता है और व्यक्ति सच्चे लोक तक पहुँच सकता है।
सुरति-योग की साधना
सुरति-योग का रहस्य एक विशेष साधना पद्धति है, जिसमें ध्यान, प्राणायाम और आत्मचिंतन के माध्यम से सुरति को आत्मा में केंद्रित किया जाता है।
सुरति-योग की प्रक्रिया:
स्वाँसों का नियंत्रण – नाभि की ओर जाने वाले श्वास को सिर के ऊपर ध्यान द्वारा ले जाना चाहिए।
ध्वनि ध्यान – सिर से सवा हाथ ऊपर ध्वनि का ध्यान करना चाहिए।
श्वासों का प्रवाह रोकना – ऊपर से नीचे नाभि की ओर जाने वाले श्वास को रोककर नासिका से बाहर छोड़ना चाहिए।
सुरति-योग का रहस्य – सुरति को इंद्रियों से हटाकर आंतरिक ध्यान में स्थिर करना चाहिए।
इस साधना के माध्यम से निरति, माया और इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होकर सुरति में विलीन हो जाती है, जिससे साधक को दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
सद्गुरु का मार्गदर्शन
सद्गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं, जो शिष्य को सुरति-योग की गहराइयों तक ले जाते हैं। बिना सद्गुरु के मार्गदर्शन के यह यात्रा संभव नहीं।
कबीर साहिब कहते हैं:
“खावता, पीवता, सोवता, जागता, रहे सद्गुरु समाई।
कहे कबीर सो भक्त रहे सुरति माहि।।”
इसका अर्थ है कि जीवन के प्रत्येक कार्य में सद्गुरु का ध्यान रखना चाहिए, जिससे सुरति स्थिर हो सके।
सद्गुरु की विशेषताएँ:
तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे होते हैं।
सच्चे ध्यान का मार्ग दिखाते हैं।
आत्मा को परमात्मा से जोड़ने में सक्षम होते हैं।
जब व्यक्ति सद्गुरु के सान्निध्य में आता है, तो उसकी सुरति जाग्रत होती है और ध्यान की उच्च अवस्था प्राप्त होती है।
धुन और शब्द का विज्ञान
सुरति-योग में ध्वनि (धुन) का भी विशेष स्थान है।
योगी ध्यान में 70 प्रकार की धुनों को सुनता है।
हर धुन एक विशेष ब्रह्मांड से संबंधित होती है।
साधक इन ध्वनियों पर ध्यान लगाकर लोक-लोकान्तर की यात्रा कर सकता है।
अंतिम लक्ष्य निःशब्द शब्द में विलीन होना है।
कबीर साहिब कहते हैं:
“जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय।
सुरति समानी शब्द में ताको काल न खाय।।”
इसका अर्थ है कि जब सुरति अनहद धुनों से ऊपर उठकर निःशब्द-शब्द में विलीन हो जाती है, तब वह काल के प्रभाव से मुक्त हो जाती है।

निष्कर्ष
सुरति-योग का रहस्य आत्मा की जागरूकता का विज्ञान है, जो व्यक्ति को आत्मज्ञान और परमात्मा से जोड़ता है। यह साधना का एक गूढ़ मार्ग है, जिसमें श्वास, ध्यान, ध्वनि और सद्गुरु की कृपा का विशेष महत्व है। यदि मनुष्य अपनी सुरति को संसार की माया से हटाकर आत्मा में स्थिर कर ले, तो वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
संत कबीर साहिब के अनुसार:
“सुरति का खेल है सारा, सुरति में रच्यो संसारा।।”
अतः जो व्यक्ति इस सुरति-योग के रहस्य को समझकर इसे साध लेता है, वह अपने जीवन को दिव्यता से भर सकता है और परम सत्य को प्राप्त कर सकता ।
अब समय आ गया है सुरति-योग का रहस्य की ओर बढ़ने का!
सुरति-योग का रहस्य केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक दिव्य मार्ग है। यदि आप भी अपनी चेतना को जागृत करना चाहते हैं और आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ना चाहते हैं, तो अभी से इस साधना को अपनाएँ।

✨ क्या आप अपनी सुरति को जागरूक करना चाहते हैं?
✨ क्या आप आत्मज्ञान की इस गूढ़ विधि को गहराई से समझना चाहते हैं?
✨ क्या आप ध्यान, योग और सद्गुरु की कृपा से आत्मा की उच्च अवस्था तक पहुँचना चाहते हैं?
तो देर मत कीजिए!
✅ ध्यान साधना को अपने जीवन में शामिल करें।
✅ सद्गुरु के मार्गदर्शन में सुरति-योग को सीखें।
✅ अपने मन और इंद्रियों को साधकर आत्मिक शांति प्राप्त करें।
💡 हमारी वेबसाइट पर और भी आध्यात्मिक ज्ञान और ध्यान साधना से जुड़े लेख पढ़ें।
📢 अपना अनुभव हमसे साझा करें और इस ज्ञान को अपने प्रियजनों तक पहुँचाएँ।
🔔 अपडेट्स के लिए हमारे न्यूज़लेटर को सब्सक्राइब करें और आध्यात्मिक यात्रा में हमारे साथ जुड़ें!
➡️ अब समय है अपनी सुरति को जगाने का! आत्मज्ञान की इस यात्रा की शुरुआत आज ही करें।
2 thoughts on “सुरति-योग का रहस्य: The Secret of Surati Yoga”